- द्वारा Santosh Singh
- Jun 21, 2023
राजनीति के वर्तमान परिदृश्य में यदि किसी बात को सबसे अधिक विकृत किया गया है, तो वह है धर्म की पवित्रता और परंपरागत पदों की गरिमा। हाल में अविमुक्तेश्वरानंद के माध्यम से जो प्रपंच सार्वजनिक मंचों पर रचा गया, वह किसी स्वतःस्फूर्त धार्मिक असंतोष का परिणाम नहीं, बल्कि एक सुनियोजित, प्रायोजित और पटकथा-बद्ध राजनीतिक प्रयोग प्रतीत होता है जिसका अंतिम लक्ष्य 2027 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव है, और प्रत्यक्ष निशाना भारतीय जनता पार्टी, विशेषकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ।
विपक्ष की विफलता और नया हथकंडा
पिछले एक दशक में तमाम चुनावी प्रयोगों, सामाजिक समीकरणों, जातिगत ध्रुवीकरण, अंतरराष्ट्रीय शोर और संवैधानिक दुहाइयों के बावजूद विपक्ष मोदी–योगी की राजनीतिक यात्रा को बाधित करने में लगातार असफल रहा है।
न नीतिगत विकल्प थे,
न विश्वसनीय नेतृत्व,
और न ही जनता के बीच स्वीकार्यता।
जब हर राजनीतिक अस्त्र कुंद हो गया, तब विपक्ष ने वह मार्ग चुना जो सदैव संकट के समय अपनाया जाता रहा है धर्म की आड़ में राजनीति।
‘स्वयंभू शंकराचार्य’ और पद की अवमानना
शंकराचार्य जैसा सर्वोच्च, तप-त्याग और शास्त्रीय परंपरा से जुड़ा पद किसी व्यक्ति विशेष की निजी महत्वाकांक्षा या राजनीतिक प्रयोगशाला का औजार नहीं हो सकता। किंतु तथाकथित “स्वयंभू शंकराचार्य” को आगे कर जिस प्रकार से सरकार विरोधी नैरेटिव गढ़ा गया, वह न केवल धार्मिक मर्यादा का उल्लंघन है, बल्कि सनातन परंपरा का खुला अपमान भी।
यह संयोग नहीं हो सकता कि वही व्यक्ति अचानक मीडिया का प्रिय बन जाता है, वही विपक्षी मंचों पर सम्मानित होता है,
और वही सत्ता-विरोधी विमर्श का चेहरा घोषित कर दिया जाता है।
यह सब स्वतः नहीं होता; यह एक लिखी हुई स्क्रिप्ट होती है, जिसके लेखक कई होते हैं और अभिनेता एक।
योगी मॉडल से भय
योगी आदित्यनाथ केवल एक मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि एक राजनीतिक सांस्कृतिक मॉडल हैं कानून-व्यवस्था, प्रशासनिक सख़्ती,
और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का मॉडल।
यही मॉडल विपक्ष के लिए सबसे बड़ा भय है, क्योंकि यह न तो जाति की बैसाखी पर टिका है, न तुष्टिकरण की राजनीति पर। ऐसे में योगी को चुनौती देने के लिए धर्म का मुखौटा पहनाया गया ताकि भ्रम पैदा किया जा सके कि सत्ता बनाम धर्म की लड़ाई चल रही है, जबकि वास्तविकता सत्ता बनाम राजनीतिक हताशा की है।
जनता अब दर्शक नहीं, निर्णायक है
इस पूरे प्रपंच का सबसे कमजोर पक्ष यही है कि इसके सूत्रधार यह भूल गए कि आज की जनता 1990 या 2004 की जनता नहीं है।
आज का मतदाता सोशल मीडिया पढ़ता है,
राजनीतिक गठजोड़ समझता है,
और यह भी जानता है कि कौन संत है और कौन रणनीतिक मोहरा।
जनता यह भली-भांति समझ चुकी है कि कौन धर्म की रक्षा कर रहा है और कौन धर्म को सत्ता-संघर्ष का औजार बना रहा है।
अविमुक्तेश्वरानंद प्रकरण कोई धार्मिक आंदोलन नहीं, बल्कि एक राजनीतिक प्रयोगशाला में रचा गया ड्राफ्ट है जिसे समय से पहले सार्वजनिक कर दिया गया।
पर यह प्रयोग भी अन्य प्रयोगों की तरह विफल होगा, क्योंकि जहाँ आस्था सच्ची हो, वहाँ स्क्रिप्ट नहीं चलती।
और जहाँ जनता जागरूक हो, वहाँ प्रपंच टिकता नहीं।
2027 की लड़ाई धर्म बनाम सत्ता नहीं, बल्कि जनविश्वास बनाम राजनीतिक छल की लड़ाई होगी और इसके परिणाम पहले से ही स्पष्ट हैं।